*सच्ची भक्ति*
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भीषण महामारी में पढ़ाई ना हो पाने के कारण स्कूल की परीक्षाएं किसी तरह समाप्त हुई।
सभी शिक्षक उत्तर पुस्तिकाएं जांच कर परीक्षा परिणाम बनाने में लगे थे शाला की उत्तर पुस्तिका जांचने के पश्चात मास्टर दीनानाथ शाम के समय अपने घर लौट रहे थे। तभी अपनी बस्ती के मंदिर में घंटियां बजाते हुए हर्ष गौरव, और महेश देखें तीनों ने मास्टर जी को प्रणाम किया-नमस्ते मास्टर जी!
हाथ जोड़कर खड़े हो गए परीक्षा हो जाने के पश्चात परिणाम आने तक शिक्षक भी ईश्वर से कम नहीं लगते।
मास्टर जी-बच्चों क्या हो रहा है?
तीनों एक साथ भगवान की प्रार्थना कर रहे थे।
बोले- मास्टर जी यूं ही भगवान के दर्शन करने आए थे,,,,,
मास्टर जी समझ गए माह के अंत में परीक्षा परिणाम आने की चिंता है भगवान को प्रसाद चढ़ाया जा रहा है प्रार्थना की जा रही है मंद मंद मुस्कुराए और उन्होंने बच्चों को सुधारने की ठानी।
अच्छा बताओ हर्ष तुम किस भगवान को मानते हो। हर्ष बोला-मैं तो ब्रह्मा जी का भक्त हूं!
और गौरव तुम? गौरव बोला-मैं तो विष्णु जी की प्रार्थना करता हूं!
अरे वाह,,,,
और महेश तुम किस देवता को मानते हो?
अरे मास्टर जी तो मैं तो अपने नाम के अनुरूप शिव जी का भक्त हूं।
वही मेरा बेड़ा पार लगाएंगे। हां तो बच्चों अगर मैं ऐसा कोई उपाय बता हूं कि तुम तीनों को तुम्हारे भगवान मिल जाए तो कैसा रहेगा?
मास्टर जी बोले।
तीनों एक साथ तपाक से बोले-हां हां बताइए मास्टर जी हम करने को तैयार हैं! भक्त पहलाद की तरह हमें भगवान अपनी गोद में बैठ आएंगे मास्टर जी हां हां क्यों नहीं! तुम ब्रह्मा जी से मिलना चाहते हो, तू रोज एक माह तक एक पौधा लगाओ और रोज उसकी देखभाल करो, उसमें पानी दो गोबर की खाद डालो ध्यान रहे वे सूखने ना पाए! और गौरव बेटा तुम रोज अपने माता-पिता के सुबह शाम चरण स्पर्श करना उनके मना करने पर भी रुकना नहीं तुम्हें विष्णु जी मिलेंगे!
अरे हां महेश तुम्हें शिव जी से मिलना है ना? तो तुम्हें 1 महीने तक ना तो झूठ बोलना है और ना ही गलत काम करना है ना किसी से मारपीट करना है अगर तुम तीनों ऐसा करते हो तो तुम्हें ईश्वर जरूर मिलेंगे!
तीनों बहुत खुश हुए और अपने घर आकर उन्होंने मास्टर जी के कहे अनुसार काम करना शुरू कर दिया। हर्ष ने पौधे लगाएं, उन्हें पानी दिया ,और उनकी खरपतवार साफ की पूरी बगिया हरी भरी हो गई और पौधों में फूल भी आने लगे। कुछ आम के पौधे हर्ष के बराबर बड़े हो गए थे। माता-पिता बहुत खुश हो रहे थे कि हर्ष बेटे ने कितना अच्छा बगीचा तैयार कर लिया है।
उधर गौरव सुबह शाम माता पिता के चरण स्पर्श करता यह देख उसके घर वालों की खुशी का ठिकाना ना रहा, वे ढेरों आशीर्वाद देते,,,, आगे बढ़ो, पढ़ाई करो, बड़े आदमी बनो, स्वस्थ रहो आदि आदि,,,,,
इधर महेश ने झूठ बोलना छोड़ दिया था, और वहां लड़ाई झगड़ा भी नहीं करता था। तीनों माह बीतने का इंतजार करने लगे, सब कामों में और माता पिता के लाड प्यार में तीनों का समय मानों पंख लगा कर उड़ गया।
जैसे ही समय पूरा हुआ तीनों इकट्ठा हुए और दौड़ लगाकर मास्टर जी के पास पहुंच गए। "अब बताओ मास्टर जी हमें ईश्वर कब और कहां मिलेंगे?"
मास्टर जी उन तीनों का इंतजार ही कर रहे थे वह बोले-अच्छा बताओ हर्ष ब्रह्मा जी क्या करते हैं?
सृष्टि का सृजन करते हैं पृथ्वी की रचना करते हैं तुमने भी तो बगीचा लगाया पृथ्वी की सुरक्षा की, तुम्हें सृजन हार के रूप में ब्रह्मा जी मिले ना तुम तो स्वयं ही ब्रह्मा हो। कहो" अहम् ब्रह्मास्मि"
अरे गौरव तुम्हारे माता-पिता तो तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकते, किसने पाल पोस कर बड़ा किया है? माता-पिता ने ना! अब बताओ विष्णु जी क्या करते हैं,,,,,, पृथ्वी का पालन पोषण करते हैं ना पालनहार हैं!
हां मास्टर जी,,,,, एकदम सही है।
" तुम्हें माता पिता के रूप में कब से मिले हैं तुम्हें नहीं पहचान ही नहीं पा रहे!
मास्टर जी ने जोर देकर कहा।
और महेश तुमने लड़ाई झगड़ा नहीं किया अर्थात संहारकारक के रूप में स्वयं महेश अर्थात शिव तुम्हें मिल गए। सहायता करते हैं शिव और भोलेनाथ है तुम भी भोले रहे सीधे रहे झूठ नहीं बोला अर्थात तुम स्वयं ही महेश हो तुम्हें तो महेश मिल गए अर्थात शिव मिल गए।
हां हां मास्टर जी आप सच कह रहे हैं मास्टर जी ने उनका परीक्षा परिणाम उनके हाथ में दिया। और कहा सच्ची ईश्वर भक्ति तुम्हारे हाथों में ही हैं तुम यदि माता पिता की सेवा करोगे, पेड़ पौधे लगाओ गे, और लड़ाई झगड़ा गाली गलौज नहीं करोगे, तो ईश्वर तुममें ही निवास करते हैं सच्ची ईश्वर भक्ति तुम्हारे हाथों में ही हैं।
तीनों बालकौ ने गुरु जी को प्रणाम किया और कहां आगे से हम इसी प्रकार का कार्य करेंगे।
मास्टर जी अपने ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश को देखकर, गदगद हो गए। और उन्हें गले से लगा लिया।
लेखिका सुधा दुबे
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